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थोड़ा और प्रयास... थोड़ी और कोशिश
बेचारे शाहरुख खान। बड़े अरमानों के साथ उन्होंने आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम खरीदी- यह सोचकर कि यह उनके लिए बुलंदियां छूने का एक और जरिया बनेगा। लेकिन हाय रे उनकी किस्मत (यदि यह केवल किस्मत ही है तो ), उनकी टीम पिछले बार की ही तरह इस बार भी फिसड्डी साबित हो रही है। बाकी कसर टीम के साथ जुड़े विवादों ने पूरी की, लेकिन शाहरुख फिर भी यही कहते फिर रहे हैं- थोड़ा और प्रयास, थोड़ी और कोशिश। आखिर वो और कर भी क्या सकते हैं।
फैजुल इस्लाम
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फैजल इस्लाम
प्रार्थना – काम नहीं आई
मार्केटिंग – मुझे वह शक्ति मिली कि मैं जी-जान से अपनी टीम को तैयार कर सकूं
स्ट्रेट्जी- पता नहीं, कहां गुम है
प्रमोशन – बस यही एक काम बांकी रह गया है
परफॉर्मेंस – पता नहीं, ये खिलाड़ी क्रिकेट खेलना जानते भी हैं या नहीं
खुदा जाने, ये क्या हुआ..... जी हां, मुझे अच्छी तरह पता है खुदा भी अपने इस होनहार बच्चे की हालत पर यही कह रहा होगा, ‘बच्चे, मैने कुछ नहीं किया और मेरे ऊपर गुस्सा होने का कोई फायदा नहीं है।‘
एसआरके (नाम ही काफी है) : वन मैन इंडस्ट्री, अपने बिंदास अंदाज के लिए मशहूर शख्सियत जिसके छूने भर से मिट्टी भी सोना हो जाता है, प्रमोशन के मामले में बेताज बादशाह, फैन्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स का लाडला, प्रतियोगियों (यदि कोई है तो) द्वारा घृणा की नजरों से देखा जाने वाला, जिसने आत्म विश्वास शब्द को नया अर्थ दिया है। नहीं, मैं न तो शाहरुख खान का जीवनी लेखक हूं और न ही रेड चिलीज की पीआर टीम का कोई नया रंगरूट। लेकिन यह जरूर है कि रुपहले पर्दे पर भगवान की तरह पूजे जाने वाले इस शख्सियत के विशेषणों के ऊपर पूरी किताब लिखी जा सकती है (कभी न कभी उनके जेहन में भी यह बात जरूर आई होगी)।
और हो भी क्यों न, उन्हें अपनी महानता पर गर्व करने का पूरा हक है। जरा उनके पिछले रिकॉर्ड पर एक नजर डालें :
एक्ट-इंग – मैं हूं बेस्ट ( सबसे ज्यादा अवार्ड्स मेरे नाम हैं)
ब्रांड-इंग – मैं हूं बेस्ट ( सबसे ज्यादा ब्रांडों के विज्ञापन मैं ही करता हूं)
नेटवर्क-इंग – मैं हूं बेस्ट ( जरा मेरे दोस्तों की लिस्ट पर गौर करें)
रेट-इंग – मैं हूं बेस्ट ( आखिर मैं ब्रैड पिट से भी ज्यादा मशहूर हूं)
क्रिकेट-इंग – मैं हूं बेस्ट ( हारने के मामले में)
क्रिकेट खेलने की बात तो दूर है, क्रिकेट के धंधे में उतरने के लिए भी बैट, बॉल, प्लेयर्स, कोच... न जाने और क्या-क्या जरूरी होता है। यह कहने में शायद कोई बुराई नहीं है कि उसका सबसे भरोसेमंद साथी – किस्मत, सबसे अच्छा हथियार- दिमाग, उसके विश्वसनीय प्यादे जिस पर उसने अपना दांव खेला – प्लेयर्स और कोच- इन सबने शाहरुख के सपने को पूरा नहीं होने देने में अपनी भूमिका बखूबी निभाई है, वो सपना जो उसने आईपीएल के माध्यम से ऊंचाइयां छूने का देखा था। आईपीएल 1 की शुरुआत शाहरुख के लिए किसी सपने से कम नहीं था- टूर्नामेंट के पहले ही दिन उनकी टीम ने ऐसा प्रदर्शन किया कि उनकी सुपरहिट फिल्म डीडीएलजे का रिकॉर्ड भी खतरे में आ गया। बादशाह और उसके दरबारियों ने खूब मजे किए, भरपूर खुशियां मनाई... और कारवां आगे बढता रहा। लेकिन टूर्नामेंट के खत्म होने तक कारवां की तस्वीर बदल चुकी थी – उसमें बिखराव आने लगा था, थकान के लक्षण नजर आने लगे और सबसे बड़ी बात कि उसका आत्म विश्वास हिल चुका था। लेकिन इससे क्या, फिल्म इंडस्ट्री के इस सबसे शक्तिशाली शख्सियत में वह माद्दा है कि वह वापसी कर सके और वो भी जोरदार तरीके से।
वह पहला सीजन था और दूसरा सीजन भी शाहरुख और उनकी केकेआर टीम के लिए मुश्किलों और विवादों की अपनी सौगात लेकर आया। जीत को छोड़ दें तो वो लगातार चर्चाओं में बने रहे – गलत और नकली वजहों के कारण। टीम ने दूसरे सीजन में अपने सफर की शुरुआत ही एक बड़े नो बॉल के साथ की, जब टीम में चार कप्तानों वाले खालिस ऑस्ट्रेलियाई आइडिया की वकालत होने लगी ( वो साधु और बाबाओं के भी दुलारे बन गए होते यदि उन्होंने अपनी टीम को द्रौपदी समझ चार की बजाय पांच कप्तान बनाए होते)। कोई आश्चर्य नहीं कि क्रिकेट के मैदान के हर दादा, सनी और शेरी ने उनके इस आइडिया को फ्री हिट की तरह हवा में उड़ा दिया। और फिर शुरू हुआ दोहरे मापदंडों को लेकर टीम के मालिक के कुछ बेहतरीन वक्तव्यों का दौर। सबसे पहले उन्होंने किसी बिना हवा के गुब्बारे की तरह पिचके दादा के ईगो को दूर करने की कोशिश की- दादा केकेआर टीम के हमेशा कप्तान रहेंगे। लेकिन जल्द ही हमें अहसास हुआ कि शाहरुख को भूलने की बीमारी है क्योंकि दो दिन बाद ही ब्रेंडन मॅक्कुलम को टीम का नया कप्तान बना दिया गया। यदि यह अपनी बात से पलटने की बीमारी का पहला उदाहरण था, तो थोड़े समय बाद ही लिट्ल मास्टर के खिलाफ उनके बयानों ने हमें और आश्चर्यचकित कर दिया। पहले तो शाहरुख सुनील गावस्कर को क्रिकेट की बारीकियों का ज्ञान देने लगे और फिर ऐसे पलटे जैसे बिल्ली को देख चूहा अपने बिल में भागता है। शाहरुख शायद यह भूल गए कि बेरी जॉन की तरह सर गावस्कर ने उन्हें कभी एक्टिंग के ट्रिक्स नहीं सिखाए। बुद्धिमानी के ये शब्द यदि एसआरके की ईगो पर चोट करने के लिए काफी नहीं थे तो रही-सही कसर उस ब्लॉग ने पूरी कर दी। इस ब्लॉग ने शाहरुख को कहीं का नहीं छोड़ा और उनकी पेशानी पर बल डाल दिए।
आईपीएल 2 अपने इंटरवल की ओर बढ रहा है और केकेआर की रेंटिंग और रैंकिंग विश्व अर्थव्यवस्था की तरह लगातार नीचे की ओर जा रही है। टीम में मैच विनर की कमी, टीम की बॉडी लैंग्वेज ऐसी कि डिप्रेशन भी शरमा जाए, कप्तान ऐसा जो आगे बढकर टीम की कमान न संभाल सके, कोच ऐसा जिसकी बातें टीम को एक करने के बजाय उसे टुकड़ों में बांट रही हैं और बल्ले के साथ अपने करियर के सबसे खराब दौर से गुजर रहा कप्तान – क्रिकेट के एक व्यवसायी के तौर पर देखें तो शाहरुख जरूर यह सोच रहे होंगे कि यह उनकी खराब किस्मत है या उन्हें थोड़ा और प्रयास करने की जरूरत है। खुदा जाने, लेकिन या तो वह दुनिया को जताने के लिए अपने चेहरे की मुस्कराहट बरकरार रखें और यह कहें कि हमें आज ही यह करके दिखाना है, क्योंकि पता नहीं कल हो न हो। या फिर अपनी किस्मत को, अपनी टीम को, अपने चाहने वालों को और सबसे ज्यादा खुद को एक दूसरा मौका दें – इस भरोसे के साथ कि अगले आईपीएल तक सबकुछ ठीक हो जाएगा। आखिर मैं हूं ना...
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